दौलत की अंधी दौड़ में, गांव सुनसान पड़े हैं ।
नाच नाच कर जो, भगवान बैठाये मंदिर में ।
वो मंदिर सुनसान पड़े हैं ।।
पुजारी पगार पर बुलाया जा रहा है,
लोग गांव का घर बेचने की जिद पर अड़े हैं ।
मत भागो दूर अपने अस्तित्व से,
गांव के महलो जैसे घर के मालिक, शहरो में सिकुड़े पड़े हैं ।।
और कहते हैं की हम तरकी की राह पर खड़े हैं ,
माना कि गांव में बरस भर रह नहीं सकते,
पर छुटिया तो गांव में मनाया करो ।।
गर्मी अच्छी न लगे, तो सर्दी में आया करो ।
सर्दी अच्छी ना लगे, तो होली पर आया करो ।
होली अच्छी ना लगे, तो दिवाली में आया करो ।
दिवाली अच्छी ना लगे, तो सम्मेलन में आया करो ।
भले तीन छुटियां मनाओ शहर में, पर एक बार तो गांव में भी आया करो ।।
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