न कर निराश खुदको, न समझ खराब खुदको,
जरा देख निगाहों में भरके उनको,
जो जी रहा है तू जिंदगी,
वो किसी और का सपना हैं।
उनके दर्द को देख, तेरा दर्द कम हो जाएगा,
तेरा दर्द तुझे नजर भी न आएगा,
जा पूछ उस मां से, उस पर क्या बीती होगी,
मरने की उम्र में, जिसने मौत देखी होगी।
जा पूछ उससे, जो मांग में सिन्दूर सजाती होगी,
सजने की उम्र में, दर्द से मांग मिटाती होगी।
जा पूछ उस बाप से, जो अब भी आने का इंतजार करता है,
जानता है सच, पर स्वीकार नहीं करता है।
भाई ने साथी खोया, बहन ने राखी,
न बन तू बेवजह निराशावादी।
उसके पास हाथ नहीं, पर काम बहुत करता हैं,
जिंदगी की जंग, लड़ने से न डरता है।
जरा आंख घुमा और देख, सब कुछ है तेरे पास,
क्यों है फिर भी तू निराश,
न समझ खराब खुदको, न कर निराश खुदको,
जो जी रहा है तू जिंदगी, वो किसी और का सपना हैं।
~ अशोक राजपुरोहित
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