Sunday, 2 May 2021

एक मुद्दत से आरजू थी फुरसत की,

मिली तो इस शर्त पर की किसी से ना मिलो|


शहरो का यूं वीरान होना कुछ यूं गजब कर गई,

बरसो से पड़े गुमसुम घरों को आबाद कर गई|


ये कैसा समय आया कि,

दूरियां ही दवा बन गई|

जिंदगी में पहली बार ऐसा वक्त आया,

इंसान ने जिंदा रहने के लिए कमाना छोड़ दिया|


घर गुलजार, सुने शहर,

बस्ती-बस्ती में कैद हर हस्ती हो गई|

आज फिर जिंदगी सस्ती,

और दौलत महंगी हो गई|



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