Monday, 11 April 2022

अगर कोई आप पर मरता है,
तो कोशिश करें वो ज़िदा रहे... 

Sunday, 9 January 2022

एक बार गांव में भी आया करो

दौलत की अंधी दौड़ में, गांव सुनसान पड़े हैं ।

नाच नाच कर जो, भगवान बैठाये मंदिर में ।

वो मंदिर सुनसान पड़े हैं ।।

पुजारी पगार पर बुलाया जा रहा है,

लोग गांव का घर बेचने की जिद पर अड़े हैं ।

मत भागो दूर अपने अस्तित्व से,

गांव के महलो जैसे घर के मालिक, शहरो में सिकुड़े पड़े हैं ।।

और कहते हैं की हम तरकी की राह पर खड़े हैं ,

माना कि गांव में बरस भर रह नहीं सकते,

पर छुटिया तो गांव में मनाया करो ।।

गर्मी अच्छी न लगे, तो सर्दी में आया करो ।

सर्दी अच्छी ना लगे, तो होली पर आया करो ।

होली अच्छी ना लगे, तो दिवाली में आया करो ।

दिवाली अच्छी ना लगे, तो सम्मेलन में आया करो ।

भले तीन छुटियां मनाओ शहर में, पर एक बार तो गांव में भी आया करो ।।

Thursday, 12 August 2021

थक गया हूं पर.....।

 थक गया हूं पर हारा नहीं, मुश्किलों को देख मुस्कुराता हूं,

लंबा सफर है चलने के लिए, हिम्मत से कदम बढ़ाता हूं। 

बहुत कंकड़ हैं रास्ते पर, कभी कभी घबरा जाता हूं, 

दिल में हिम्मत के दीप जलाकर , फिर चलता जाता हूं। 

थक गया हूं पर ........। 

बहुत तोड़ा है लोगों ने मुझको, मै फिर खड़ा हो जाता हूं, 

हारना मैने सिखा नहीं, हार कर भी जीत जाता हूं। 

पार होगा ये लंबा सफर, ये गीत मैं गुनगुनाता हूं, 

थक गया हूं पर हारा नहीं, मुश्किल को देख मुस्कुराता हूं।

सूरज भी आया, चाँद भी आया,

अन्धियारा भी आया, उजाला भी आया,

कभी समझाया, कभी डराया , कभी उठाया, कभी गिराया, 

मैं चलता रहा, पर मंजिल मेरी, कोई भटका ना पाया। 

मंजिल पार करने की ठानी है, इसलिए आशाओं के दीप जलाता हूं, 

थक गया हूं पर हारा नहीं, मुश्किलों को देख मुस्कुराता हूं। 😊😊


~ अशोक राजपुरोहित

Friday, 23 July 2021

न समझ निराश खुदको

 न कर निराश खुदको, न समझ खराब खुदको,

जरा देख निगाहों में भरके उनको,

जो जी रहा है तू जिंदगी,

वो किसी और का सपना हैं।

उनके दर्द को देख, तेरा दर्द कम हो जाएगा,

तेरा दर्द तुझे नजर भी न आएगा,

जा पूछ उस मां से, उस पर क्या बीती होगी,

मरने की उम्र में, जिसने मौत देखी होगी।

जा पूछ उससे, जो मांग में सिन्दूर सजाती होगी,

सजने की उम्र में, दर्द से मांग मिटाती होगी।

जा पूछ उस बाप से, जो अब भी आने का इंतजार करता है,

जानता है सच, पर स्वीकार नहीं करता है।

भाई ने साथी खोया, बहन ने राखी,

न बन तू बेवजह निराशावादी।

उसके पास हाथ नहीं, पर काम बहुत करता हैं,

जिंदगी की जंग, लड़ने से न डरता है।

जरा आंख घुमा और देख, सब कुछ है तेरे पास,

क्यों है फिर भी तू निराश,

न समझ खराब खुदको, न कर निराश खुदको,

जो जी रहा है तू जिंदगी, वो किसी और का सपना हैं।


~ अशोक राजपुरोहित

Monday, 19 July 2021

सही गलत में, मैं उलझ गया

सही गलत में, मैं उलझ गया,
समझ ना पाया, क्या सही, क्या गलत।
अगर सही सही है, तो सही के साथ क्यों गलत।
गलत अमीर, सही गरीब, क्या समझूं सही सही या सही गलत।
अगर सही सही तो रास्ता इतना कठोर क्यों,
हर मोड़ पर, मिलता क्यों, इतना अफसोस क्यों,
क्या बोलूं सही सही क्या सही गलत।
या फिर मैं समझूं, सही बड़ा अनमोल है,
इसका न कोई तोल है,
खरीदार नहीं, सही को खरीदने के लिए,
सफर लंबा है, चलने के लिए।

 ~ अशोक राजपुरोहित

 Waqt ke sath insaan ko aage badhna chahiye,

warna yaadein takleef deti hai zindagi bhar😎

     ~ Ashok Singh Rajpurohit

Wednesday, 19 May 2021

 निर्धन गिरे पहाड़ से, कोई न पूछे हाल 

धनी को कांटा लगे, पूछें लोग हजार ।

Tuesday, 18 May 2021

एक सुबह होगी

एक सुबह होगी


जब लोगो के कंधो पर ऑक्सिजन सिलेंडर नही दफ्तर का बैग होगा

गली में एंबुलेंस नही स्कूल की वैन होगी

और भीड़ दवा खानो पे नही चाय की दुकानो पर होगी।


एक सुबह होगी


जब पेपर के साथ पापा को काढ़ा नही चाय मिलेगी,

दादा जी बाहर निकल के बेखौफ पार्क में गोते लगाएंगे,

और दादी टेरेस पर नही मंदिर में जल चढ़ा के आयेंगी।


एक सुबह होगी


जब हाथो में कैरम और लूडो नही बैट और बाल होगा,

मैदानो में सन्नाटे नही शोर का भार होगा,

और शहरो की सारी पाबंदी हटेगी और फिर से त्योहार होगा।


एक सुबह होगी


जब जी भर के सबको गले लगाएंगे,

कड़वी यादों को दफन कर फिर से मुस्कुराएंगे,

और दुनिया को कह देंगे नज़र झुका लो हम वापस आए है।


तब तक के लिए -


दो गज़ की दूरी, मास्क है ज़रूरी


Be safe and take care


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Sunday, 2 May 2021

एक मुद्दत से आरजू थी फुरसत की,

मिली तो इस शर्त पर की किसी से ना मिलो|


शहरो का यूं वीरान होना कुछ यूं गजब कर गई,

बरसो से पड़े गुमसुम घरों को आबाद कर गई|


ये कैसा समय आया कि,

दूरियां ही दवा बन गई|

जिंदगी में पहली बार ऐसा वक्त आया,

इंसान ने जिंदा रहने के लिए कमाना छोड़ दिया|


घर गुलजार, सुने शहर,

बस्ती-बस्ती में कैद हर हस्ती हो गई|

आज फिर जिंदगी सस्ती,

और दौलत महंगी हो गई|



Friday, 27 November 2020

 असली पहलवान की पहचान अखाड़े में नहीं, ज़िंदगी में होवे है, ताकि जब ज़िंदगी तुम्हें पटके तो तुम फिर खड़े हो और ऐसा दाव मारो कि ज़िंदगी चित्त हो जाए !! ( फ़िल्म सुल्तान)

Wednesday, 22 July 2020

हज़ारों शिकायतें रट रखीं थी सुनाने को उन्हें किताबों की तरह, वो मुस्कुरा कर ऐसे मिले कि फ़िर एक भी याद नहीं आई :)